गुरुवार, 8 जुलाई 2010

बोले तू कौनसी बोली ?


कुछ अरसा हुआ इस बात को...पूरानें मित्र परिवार के घर भोजन के लिए गए थे। उनके यहाँ पोहोंचते ही हमारा परिचय, वहाँ, पहले से ही मौजूद एक जोड़े से कराया गया। उसमे जो पती महोदय थे, मुझ से बोले,
"पहचाना मुझे?"

मै: "माफ़ी चाहती हूँ...लेकिन नही पहचाना...! क्या हम मिल चुके हैं पहले? अब जब आप पूछ रहें है, तो लग रहा है, कि, कहीँ आप माणिक बाई के रिश्तेदार तो नही? उनके मायके के तरफ़ से तो यही नाम था...हो सकता है, जब अपनी पढाई के दौरान एक साल मै उनके साथ रही थी, तब हम मिले हों...!"

स्वर्गीय माणिक बाई पटवर्धन, रावसाहेब पटवर्धन की पत्नी। रावसाहेब तथा उनके छोटे भाई, श्री. अच्युत राव पटवर्धन, आज़ादी की जंग के दौरान, राम लक्ष्मण की जोड़ी कहलाया करते थे। ख़ुद रावसाहेब पटवर्धन, अहमदनगर के 'गांधी' कहलाते थे...उनका परिवार मूलत: अहमदनगर का था...इस परिवार से हमारे परिवार का परिचय, मेरे दादा-दादी के ज़मानेसे चला आ रहा था। दोनों परिवार आज़ादी की लड़ाई मे शामिल थे....

मै जब पुणे मे महाविद्यालयीन पढाई के लिए रहने आयी,तो स्वर्गीय रावसाहेब पटवर्धन, मेरे स्थानीय gaurdian थे।
जिस साल मैंने दाखिला लिया, उसी साल उनकी मृत्यू हो गयी, जो मुझे हिला के रख गयी। अगले साल हॉस्टल मे प्रवेश लेने से पूर्व, माणिक बाई ने मेरे परिवार से पूछा,कि, क्या, वे लोग मुझे छात्रावास के बदले उनके घर रख सकते हैं? अपने पती की मृत्यू के पश्च्यात वो काफ़ी अकेली पड़ गयीं थीं...उनकी कोई औलाद नही थी। मेरा महाविद्यालय,उनके घरसे पैदल, ५ मिनटों का रास्ता था।

मेरे परिवार को क़तई ऐतराज़ नही था। इसतरह, मै और अन्य दो सहेलियाँ, उनके घर, PG की हैसियत से रहने लगीं। माणिक बाई का मायका पुणे मे हुआ करता था...भाई का घर तो एकदम क़रीब था।
उस शाम, हमारे जो मेज़बान थे , वो रावसाहेब के परिवार से नाता रखते थे/हैं....यजमान, स्वर्गीय रावसाहेब के छोटे भाई के सुपुत्र हैं...जिन्हें मै अपने बचपनसे जानती थी।

अस्तु ! इस पार्श्व भूमी के तहत, मैंने उस मेहमान से अपना सवाल कर डाला...!

उत्तर मे वो बोले:" बिल्कुल सही कहा...मै माणिक बाई के भाई का बेटा हूँ...!"

मै: "ओह...! तो आप वही तो नही , जिनके साथ भोजन करते समय हम तीनो सहेलियाँ, किसी बात पे हँसती जा रहीँ थीं...और बाद मे माणिक बाई से खूब डांट भी पड़ी थी...हमारी बद तमीज़ी को लेके..हम आपके ऊपर हँस रहीँ हो, ऐसा आभास हो रहा था...जबकि, ऐसा नही था..बात कुछ औरही थी...! आप अपनी मेडिसिन की पढाई कर रहे थे तब...!"

जवाब मे वो बोले: " बिल्कुल सही...! मुझे याद है...!"

मै: " लेकिन मै हैरान हूँ,कि, आपने इतने सालों बाद मुझे पहचाना...!२० साल से अधिक हो गए...!"

उत्तर:" अजी...आप को कैसे भूलता...! उस दोपहर भोजन करते समय, मुझे लग रहा था,कि, मेरे मुँह पे ज़रूर कुछ काला लगा है...जो आप तीनो इस तरह से हँस रही थी...!"

खैर ! हम लोग जम के बतियाने लगे....भाषा के असमंजस पे होने वाली मज़ेदार घटनायों का विषय चला तो ये जनाब ,जो अब मशहूर अस्थी विशेषग्य बन गए थे, अपनी चंद यादगारें बताने लगे...

डॉक्टर: " मै नर्सिंग कॉलेज मे पढाता था, तब की एक घटना सुनाता हूँ...एक बार, एक विद्यार्थिनी की नोट्स चेक कर रहा था..और येभी कहूँ,कि, ये विद्यार्थी, अंग्रेज़ी शब्दों को देवनागरी मे लिख लेते थे..नोट्स मे एक शब्द पढा,' टंगड़ी प्रेसर'...मेरे समझ मे ना आए,कि, ये टांग दबाने का कौन-सा यंत्र है,जिसके बारे मे मुझे नही पता...! कौतुहल इतना हुआ,कि, एक नर्स को बुला के मैंने पूछ ही लिया..उसने क़रीब आके नोट्स देखीं, तो बोली, 'सर, ये शब्द 'टंगड़ी प्रेसर' ऐसा नही है..ये है,'टंग डिप्रेसर !'

आप समझ ही गए होंगे...ये क्या बला होती है...! रोगी का, ख़ास कर बच्चों का गला तपास ते समय, उनका मुँह ठीक से खुलवाना ज़रूरी होता है..पुराने ज़माने मे तो डॉक्टर, गर घर पे रोगी को देखने आते,तो, केवल एक चम्मच का इस्तेमाल किया करते..!

हमलोगों का हँस, हँस के बुरा हाल हुआ...और उसके बाद तो कई ऐसी मज़ेदार यादेँ उभरी...शाम कब गुज़र गयी, पता भी न चला..!

17 टिप्‍पणियां:

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

बहुत मजेदार..

आचार्य उदय ने कहा…

सुन्दर लेखन।

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

रोचक संस्मरण !

सूर्यकान्त गुप्ता ने कहा…

हा हा हा ……क्या बतायें अन्ग्रेजी को। नटूरे और फ़ुटुरे की याद दिला दी। एक बार टीचर बच्चे से परेशान हो गये क्योंकि वह नेचर का उच्चारण नटूरे करता था। बार बार उससे कहते डिक्शनरी देख के आना और सही मतलब बताना। जब नही बता सका वह लड़का तो टीचर बोले क्या लड़के हो इतना भी नही जानते। तुम्हे रस्टिकेट किया जाता है स्कूल से। फिर वह लड़का बोला ऐसा मत करिये सर मेरा फ़ुटुरे(फ़्यूचर) का क्या होगा। अच्चा संस्मरणअ।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

:):)...रोचक संस्मरण

soni garg ने कहा…

mithi yaden.........

arvind ने कहा…

हा हा हा ……रोचक संस्मरण !

शारदा अरोरा ने कहा…

mazedar...tangdi presar bhi ..natoore fatoore bhi ...chalo ek ham bhi suna de kissa ...meree Kerala ki ek teacher naee naee hindi seekh rahi theen ...mausam bahut achchha hai kahna chah rahi theen ....kah baithhee ' aaj samosa bahut achcha hay.'

kshama ने कहा…

Ha,ha,ha...nature,future aur samosa!
Rok nahi payi,khudko khudki hi post pe tippani karte hue!

Mired Mirage ने कहा…

वाह, टंगड़ी प्रैसर बहुत सही लगा। पुरानी यादें जीवन की अमूल्य निधि बन जाती हैं।
घुघूती बासूती

सम्वेदना के स्वर ने कहा…

एक दक्षिण भारतीय मित्र किसी के घर खाने पर आए थे. मेज़बान ने कहा, “ खाइए खाइए, शर्माइए मत. बस अपना घर ही समझिए.” एक बार वो सज्जन, उन्हीं दक्षिण भारतीय मित्र के घर खाने पर गए. तो वो बोले, “खाइए खाइए, शर्म तो नहीं है ना, अपना घर समझा है.” मेहमान ने बात समझ ली थी इसलिए बुरा नहीं माना.

abhi ने कहा…

waah mast :)
टंग डिप्रेसर :P

Avinash Chandra ने कहा…

laga jaise koi hindi ki kitaab jo mujhe bahut priy hai, aalmaaree se nikali, sabse khaas panna palta..padha, muskaya aur band kiya..

sansmaran to sansmaran hai...aapka lekhan bahut shandar hai..

bahut bahut badhai

सुमन'मीत' ने कहा…

man khush ho gya .......

स्वाति ने कहा…

bahut mazedar...

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत देर से पहुँच पाया ....माफी चाहता हूँ..

संजय भास्कर ने कहा…

.रोचक संस्मरण