रविवार, 2 मई 2010

वक़्त की धारा

कब,कौन पूछता मरज़ी उसकी,
अग्नी से, वो क्या जलाना चाहे है,
जहाँ लगाई,दिल या दामन,जला गयी!

कुम्हार आँगन बरसी जलभरी बदरी,
थिरक,थिरक गीले मटके  तोड़ गयी..
सूरज से सूखी खेती तरस गयी !

कलियों का बचपन ,फूलों की  जवानी,
वक़्त की निर्मम धारा बहा गयी,
थकी, दराज़ उम्र को पीछे छोड़ गयी...

20 टिप्‍पणियां:

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

वाह बहुत खूब ....
कुम्हार आँगन बरसी जलभरी बदरी,
थिरक,थिरक गीले मटके तोड़ गयी..
सूरज से सूखी खेती तरस गयी !
क्या बात है ... लाजवाब !

Dimps ने कहा…

Hello ji,

Kya imagination hai!!!
"जहाँ लगाई,दिल या दामन,जला गयी!"

Bahut hi badiya :)

Regards,
Dimple
http://poemshub.blogspot.com

SAMVEDANA KE SWAR ने कहा…

एक अच्छा कॉन्ट्रास्ट दिखाया है आपने इस कविता में...दिल और दामन तथा कुम्भकार और किसान का... कच्चे बर्तनों का बारिश से टूटना और बिना बारिश खेतों का सूखना... बहुत बढिया...

Shekhar Suman ने कहा…

bahut hi umdaah rachna.....
badhai....
regards...
http://i555.blogspot.com/

अरूण साथी ने कहा…

कुम्हार आँगन बरसी जलभरी बदरी,
थिरक,थिरक गीले मटके तोड़ गयी..
सूरज से सूखी खेती तरस गयी !


यही आसमनता जीवन है जिसे कोइ समझ नही सका.

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

वक्त बड़ी हस्ती है...
अगली दफा एक उत्साह से लबरेज कविता की उम्मीद....

hem pandey ने कहा…

'वक़्त की निर्मम धारा' किसी को नहीं छोडती. आवश्यकता है उसे अनकूल दिशा देने की.

Apanatva ने कहा…

bahut sunder tareeke se apne bhavo ko hamesha kee tarah abhivykt kiya hai aapne....
aabhar .

sangeeta swarup ने कहा…

वक्त को कब कौन रोक पाया है....बहुत खूबसूरती से लिखा है..

बेचैन आत्मा ने कहा…

वक्त की धारा के आगे सभी अपने को असहाय पते हैं.
..अच्छे भाव.

kunwarji's ने कहा…

समय कि ये निष्ठुरता भी कितनी सरलता से बता दी,शब्दों का संयोजन सच में लाजवाब रहा!

कुंवर जी,

राकेश कौशिक ने कहा…

यहाँ किसी की मर्जी ना ही पूछी जाती ना ही किसी की मर्जी चलती - शानदार शब्द और भावों के लिए आभार - अति सुंदर

Arvind Mishra ने कहा…

निसर्ग की निर्ममता पर मर्मस्पर्शी संबोधन !

RAJNISH PARIHAR ने कहा…

वक़्त की निर्मम धारा बहा गयी,
थकी, दराज़ उम्र को पीछे छोड़ गयी... वक़्त से सबको हार माननी पड़ती है,गहरे से गहरा ज़ख्म भी वक़्त भर ही देता है...

shikha varshney ने कहा…

bahut khubsurti se bhavon ko shabdon men piroya hai aapne ..behtareen

अरुणेश मिश्र ने कहा…

प्रशंसनीय ।

Tej Pratap Singh ने कहा…

aap ka dhanaywaad
puri baat pakdne ke liye aap ko mere pichle post par jana hoga.

संजय भास्कर ने कहा…

..अच्छे भाव.

जयकृष्ण राय तुषार ने कहा…

bahut khoobsurat kavita hai badhai

ज्योति सिंह ने कहा…

कुम्हार आँगन बरसी जलभरी बदरी,
थिरक,थिरक गीले मटके तोड़ गयी..
सूरज से सूखी खेती तरस गयी
kamaal ki likhi hai ,bahut achchhi