गुरुवार, 27 मई 2010

दादीमाँ का नैहर..

मेरी उम्र कुछ तीन चार साल की रही होगी, दादीमाँ मुझे खम्बात ले गयीं थीं. यह स्थल गुजरात में है.एक ज़माने में मशहूर और व्यस्त बन्दर गाह था.  यहीं उनका नैहर था.  हालाँ की,मै  बहुत छोटी थी, लेकिन वह हवेली नुमा मकान और उसका  परिसर मेरे दिमाग में एक तसवीर की तरह बस गया.

उस हवेली का प्रवेश द्वार खूब नक्काशी दार लकड़ी और पीतल का बना हुआ था. वहाँ से अन्दर प्रवेश करतेही ,ईंट की दीवारों से घिरा हुआ एक बड़ा-सा बगीचा था. उन दीवारों में जगह,जगह गोल झरोखे बने हुए थे, जहाँ से बाहर  का मंज़र  दिखाई देता.
बगीचे की आखरी छोर पे बना दरवाज़ा  , एक बड़े-से  सहन में खुलता. यहाँ पे नीचे फर्श लगाया हुआ था. बीछ में तीन बड़े गद्दे डाले हुए झूले थे. इस सहन के तीनों ओर दो मंजिला  मकान था. आगे और पीछे चौड़े बरामदेसे घिरा हुआ.

सहन के ठीक मध्य में, हवेली में प्रवेश करतेही, बहुत बड़ा दालान था. यहाँ भारतीय  तरीके की बैठक सजी हुई रहती. अन्य साजों सामाँ नक्काशीदार लकड़ी और पीतल से बना हुआ था. दीवारों पे कहीं कहीं बड़े,बड़े आईने लगे थे. इस दालान के बाद और दो दालान थे. दूसरे दालान में अक्सर जो मेहमान घरमे रुकते थे, उनके साथ परिवार के लोग बाग बैठा करते.पहला दालान  दिनमे आने जाने वाले मेहमानों के लिए था. तीसरे दालान में केवल परिवार के सदस्य मिल बैठते. महिलाओं के हाथ में अक्सर कुछ हुनर का काम जारी रहता.

इस हवेली से समंदर का किनारा काफ़ी पास में था. सुबह शाम मुझे वहाँ घुमाने ले जाया जाता था.  उन्हीं दिनों ,वहाँ मौजूद ,पूरे परिवार की एक तसवीर खींची गयी थी.

इस बात को अरसा हो गया. वहाँ दोबारा जाने का मौक़ा मुझे नही  मिला. एक दिन दादीमाँ के साथ पुरानी तस्वीरें देख रही थी,तो वह तस्वीरभी दिखी. सहसा मैंने दादीमाँ से अपने  ज़ेहन में बसे उस मकान का वर्णन किया और पूछा, की, क्या वह मकान वाकई ऐसा था, जैसाकी मुझे याद था?
दादीमाँ हैरत से बोलीं:" हाँ ! बिलकुल ऐसा ही था...! मै दंग हूँ,की,इतनी बारीकियाँ तुझे याद हैं...!"

फिर बरसों गुज़रे. मेरा ब्याह हो गया...मेरे दादा जी के मृत्यु पश्च्यात दादीमाँ  एकबार मेरे घर आयीं. मेरी छोटी  बहन भी उसी शहर में थी. वह भी उन्हें मिलने आयी हुई थी. तब सपनों को लेके कुछ बात छिड़ी.
मैंने कहा :" पता नही, क्या बात है,लेकिन आज तलक सपनों में मै गर कोई घर देखती हूँ तो वह मेरे नैहर का ही होता है..और रसोई भी वही पुरानी लकड़ी के चूल्हे  वाली...मेरे ससुरालवाले भी मुझे उसी घर में नज़र आते हैं..!"
बहन बोल पडी:" कमाल है ! यही मेरे साथ होता है..मुझे वही अपना बचपन का घर दिखता है...!"
इसपर दादीमाँ बोल उठीं:" मुझे शादी के बाद इस मकान में रहते ७२ साल गुज़र गए, पर मुझे आज भी वही खम्बात का मकान, मेरे घर की तौरसे सपनों में नज़र आता है..!"

सहज मेरे मन में ख़याल आया...लड़कियों को कहा जाता है,की, ब्याह के बाद ससुराल का घर ही तुम्हारा घर है...पर जिस मकान में पले बढ़ें, वहाँ की जड़े कितनी गहरी होती हैं, वही मकान अपना घर लगता है,सपनों में सही...!

ऊपर बना भित्ती चित्र उस खम्बात के घर का बगीचा है,जो मुझे याद रह गया..कुछ पेंटिंग, कुछ कढाई और कुछ क्रोशिया..इन सबके ताल मेल से कुछ दिनों पूर्व मैंने बनाया..काश! दादीमाँ के रहते बनाया होता!




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26 टिप्‍पणियां:

kunwarji's ने कहा…

"..काश! दादीमाँ के रहते बनाया होता! "
ऐसे कितने ही काश....."काश" ही रह जाते है ना.....

आप यादो को सही रूप दे रहो जी....

कुंवर जी,

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

स्मृति पटल में कई बातें गहरी छाप छोड़ जाती हैं जो भुलाये न भूलती है ... इन्ही बातों से अपनी ज़िन्दगी भी बनी होती है ... आपका वर्णन बहुत असरदार हैऔर नक्काशी का तो जवाब नहीं ...

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

सच है दी, लड़कियों का आधे ज़्यादा जीवन ससुराल में गुज़रता है, लेकिन सपने मैके के घर के ही आते हैं. क्योंकि हमारी जड़ें तो वहीं रह जातीं हैं न. सुन्दर पोस्ट. आपके घर ने तो मेरे गांव के घर की याद दिला दी.

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

बाबू देवकी नन्दन खत्री जी के उपन्यासों की याद दिला दी...

सम्वेदना के स्वर ने कहा…

आपके पोस्ट की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि वह एक सम्वेदनशील मन से निकलती है. एक कलाकार हृदय ही इतनी बारीक दृष्टि से अवलोकन कर सकता है.

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति संवेदनशील हृदयस्पर्शी मन के भावों को बहुत गहराई से लिखा है

'उदय' ने कहा…

...अदभुत यादें !!!

sangeeta swarup ने कहा…

बहुत बढ़िया...सुन्दर....संवेदनशील...

Apanatva ने कहा…

bahut sunder man aur kala kee dhanee ho.

jado se jude rahne me hee sahee artho me
humara panapana hota hai .
bada achha lagta hai blog par aana......
jo likhatee ho dil kee gahraiyo se jo likhtee ho .

abhi ने कहा…

humein to aksar aisi post se kuch baatein yaad aa jati hai..
bahut achha laga :)

Basanta ने कहा…

A very sensitive, nostalgic narration and beautiful art!

राजेन्द्र मीणा ने कहा…

सुन्दर रोचक और ...कुछ याद दिलाने वाली पोस्ट ..यादों को बड़े सहेज कर रखते है हम ,,कभी कभी जीने का सहारा बन जाती है ,,तो कभी अकलेपन की साथी

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

ये सिर्फ़ महिलाओं के साथ ही नहीं होता. बचपन की या्दें हमेशा जुड़ी रहती हैं. बहुत अच्छा लिखा है.

उम्मेद गोठवाल ने कहा…

बहुत प्रभावी....सुन्दर , सशक्त, सार्थक प्रस्तुति.....शुभकामनाएं।

Parul ने कहा…

dadi...nani....maa....kisi khali kone ko bharne ke liye bahut hai!!

Arvind Mishra ने कहा…

"पर जिस मकान में पले बढ़ें, वहाँ की जड़े कितनी गहरी होती हैं, वही मकान अपना घर लगता है"
जी बिलकुल सही कहा आपने ,सहज तो यही लगता है और आपकी चित्रकारी तो सदैव ही मौलिकता से भरी होती है !

अनामिका की सदाये...... ने कहा…

kuchh palo ke liye ham bhi aapke sapno ke saath saath chal diye aapke nauhar wale ghar me aur bhraman kar aaye aur chitr dwara park ka nazara bhi kar liye. samwedansheel rachna.badhayi.

राकेश कौशिक ने कहा…

"काश! दादीमाँ के रहते बनाया होता!" देर आये दुरुस्त आये

शारदा अरोरा ने कहा…

संवेदन-शील कलम ने जैसे चित्र ही खींच दिया हो...कितनी गहरी जड़ें हैं हमारे बचपन की ...बस भोले मन पर पड़ी वही छाप तो सारी उम्र बोलती रहती है ।

Shekhar Suman ने कहा…

aur haan mere blog par...
तुम आओ तो चिराग रौशन हों.......
regards
http://i555.blogspot.com/

Shekhar Suman ने कहा…

bahut hi samwedansheel rachna....
marmik chitran...

सम्वेदना के स्वर ने कहा…

इस बार आपकी टिप्पणी की कमी बहुत खली हमारी पोस्ट पर... बंदिश तो कोई नहीं, पर आदत सी हो गई है. कोई न आए तो मन में खटका सा रहता है.

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

संवेदनशील व हृदयस्पर्शी प्रस्तुति.

अरुणेश मिश्र ने कहा…

शब्द विन्यास
लाजबाव ।
कथ्य अत्यन्त रोचक ।
सत्य प्रभावी ।
शैली सरस सहज ।

क्षमा जी . संस्मरण . स्मृति लेखन मे आप सिद्ध हैं ।

अरूण साथी ने कहा…

संवेदना लिए

Pyaasa Sajal ने कहा…

sach much jis jagah se yaadein judee ho us jagah se apnapan ek alag hi star ka hota hai,kahoon ki wahan ki deewaron darvaazo se bhi lagaav hota hai to galat nahi hoga...is baat ko mahsoos kiya hai maine...ab jab ghar se door jaane ka waqt jeevan me aa raha hai tab in baaton ko bahut mahsus kar paaya aur is lekh se jarur mel rakhta hoon