सोमवार, 31 मई 2010

हाले चमन..

नुक्कड़,नुक्कड़ गधे  खड़े हैं,
आगे पूजा के फूल हैं,
गलों में उनके हार हैं,
नन्हीं कलियाँ मरती हैं,
इनकी उम्र दराज़ है,
बुतों से बने  बगीचे हैं,
फूल औ,परिंदे कहाँ  हैं?
हरसूँ झुलसाती धूप है,
छाया का निशाँ नही है,
हाले चमन क्या होगा?

14 टिप्‍पणियां:

वन्दना ने कहा…

bahut sundar aur gahri baat kahi hai.

kunwarji's ने कहा…

"बुतों से बने बगीचे हैं,
फूल औ,परिंदे कहाँ हैं?
हरसूँ झुलसाती धूप है,
छाया का निशाँ नही है"
:)

kunwar ji,

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

barbaad gulistan karne ko bas ek hi ullu kaafi har saakh par ullu baitha hai anjaame gulistan kya hoga

arvind ने कहा…

bahut badhiya. ek sher hai----------har shakh pe ullu baitha hai anjaame gulista kya hoga,jab ek hi ullu kafi hai barbaade gulista karane ko.

अरुणेश मिश्र ने कहा…

अति सुन्दर रचना ।

सम्वेदना के स्वर ने कहा…

घबराने की बात नहीं क्षमा जी, उन बुतों के महिमामंडन और मस्तकाभिषेक के लिए परिंदे हैं न..

अरूण साथी ने कहा…

बहुत सुन्दर

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

फूल औ,परिंदे कहाँ हैं?
हरसूँ झुलसाती धूप है,
छाया का निशाँ नही है,
हाले चमन क्या होगा?
ये पंक्ति बहुत अच्छी हैं.

Mrs. Asha Joglekar ने कहा…

बुतों से बने बगीचे हैं,
फूल औ,परिंदे कहाँ हैं?
mayawati jaise do char aur jut jayen to yahee hona hai.

soni garg ने कहा…

very true and very deep thoughts .........

सुमित प्रताप सिंह ने कहा…

बहुत बढ़िया रचना...

'उदय' ने कहा…

...बेहतरीन !!!

संजय भास्कर ने कहा…

आप बहुत सुंदर लिखती हैं. भाव मन से उपजे मगर ये खूबसूरत बिम्ब सिर्फ आपके खजाने में ही हैं

Arvind Mishra ने कहा…

हर शाख पर उल्लू बैठे हैं अंजामे गुलिस्तां क्या होगा !
इशारे से आपने बड़ी बात कही है !